छोटे पर्दे की चमक बड़े पर्दे पर फीकी: एक असफल प्रयास

छोटे पर्दे पर जिन किरदारों ने दर्शकों को हंसाया और हंसाया, उन्हें बड़े पर्दे पर लाने की कोशिश अक्सर जोखिम भरी होती है। यह फिल्म इसी जोखिम का एक असफल उदाहरण बनकर सामने आई है। टीवी पर हल्के-फुल्के लगते किरदार, फिल्म के दो घंटे के रनटाइम में सिर्फ थकान और बोरियत पैदा करते हैं। कहानी की जगह शोर है, हास्य की जगह फूहड़ता, और मनोरंजन की जगह निराशा।


• *कहानी में क्या है दम?


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फिल्म की कहानी मनमोहन तिवारी और विभूति मिश्रा की पुरानी प्रतिद्वंद्विता के इर्द-गिर्द घूमती है। इसी बीच, शांति और क्रांति नाम के दो गुंडे भाई कहानी में एंट्री लेते हैं। दोनों भाइयों को अंगूरी और अनीता से प्यार हो जाता है, और यहीं से शुरू होती है बेतुकी घटनाओं और जबरन खींची गई परिस्थितियों की एक लंबी कतार। कहानी आगे बढ़ने के बजाय बार-बार फूहड़ चुटकुलों के सहारे टिकने की कोशिश करती है। पाद से जुड़े संवाद, दोअर्थी टिप्पणियां, और देह-केंद्रित हास्य इतने ज़्यादा हावी हैं कि कहानी का संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। कई दृश्य असहज करते हैं, कई सीधे तौर पर उबाऊ लगते हैं, और अंत तक आते-आते दर्शक का धैर्य जवाब देने लगता है। दैनिक भास्कर ने इस फिल्म को 5 में से 1 स्टार की रेटिंग दी है।


• *अभिनय का स्तर कैसा?


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आसिफ शेख और रोहिताश्व गौर अपने जाने-पहचाने किरदारों में सहज दिखे हैं, लेकिन कमजोर पटकथा उन्हें बांधे रखती है। शुभांगी अत्रे कुछ पलों के लिए अपनी छाप छोड़ती हैं, पर उनके हिस्से भी दोहराव ही आता है। विदिशा श्रीवास्तव को करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं मिला है। रवि किशन ऊर्जा लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर लेखन उनकी मौजूदगी का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। सहायक कलाकारों की भीड़ तो है, पर उनका इस्तेमाल कहानी को मजबूत बनाने में कहीं नहीं दिखता।


• *निर्देशन और तकनीकी पहलू


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निर्देशक ने टीवी की दुनिया को सीधे बड़े पर्दे पर उतारने की कोशिश की है, लेकिन सिनेमाई भाषा और संवेदनशीलता की कमी साफ झलकती है। पटकथा का कमजोर होना, हास्य का गलत इस्तेमाल, और कहानी का बिखराव इसे एक निराशाजनक अनुभव बनाता है।

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