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सेंसर बोर्ड की कार्यप्रणाली से छोटे प्रोड्यूसर्स परेशान:लगाया भेदभाव का आरोप, सीबीएफसी के अधिकारी नहीं देते हैं जवाब


सेंसर बोर्ड हमेशा अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चर्चा में रहता है। भारत में केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) फिल्मों की सामग्री जांचकर प्रमाणित करता है, लेकिन कटौती और सर्टिफिकेशन की प्रक्रिया पर सवाल बने रहते हैं। रूढ़िवादी दृष्टिकोण, राजनीतिक हस्तक्षेप और अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के टकराव ने इसे विवादों का केंद्र बनाया है। अब कुछ प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स ने सेंसर बोर्ड (CBFC) में हो रही देरी की शिकायत की है, खासकर मुंबई ऑफिस में जहां अब 45 दिन से ज्यादा यानि कि दो-तीन महीने लग जाते हैं। पहले 15-20 दिनों में सर्टिफिकेट मिल जाया करता था, लेकिन अब छोटे प्रोड्यूसर्स को भारी परेशानी हो रही है।​​ निर्माता-निर्देशक और लेखक धीरज मिश्र अपनी फिल्म 'नादान' के लिए अक्टूबर से जूझ रहे हैं। वे कहते हैं- छोटी फिल्मों के लिए अतिरिक्त शुल्क और देरी से भारी नुकसान हो रहा। ओटीटी चैनल सर्टिफिकेट बिना मंजूरी नहीं देते। सेंसर लेना फिल्म बनाने से कठिन हो गया। छोटी बजट और क्षेत्रीय फिल्मों के लिए अलग से समिति बनाई जाए और उनसे कोई अतिरिक्त शुल्क न लिया जाए। जिस तरह से कम बजट की फिल्में तेजी से बन रही हैं, अगर वे समय पर रिलीज नहीं होंगी तो उन्हें आर्थिक नुकसान होगा और ऐसी फिल्मों का निर्माण कम हो सकता है या बंद भी पड़ सकता है। मुंबई v/s दिल्ली: लोड का फर्क प्रोड्यूसर-डायरेक्टर दिनेश कुमार यादव भी मुंबई में सेंसर सर्टिफिकेट मिलने की देरी से त्रस्त हैं।। उनकी फिल्में 'जय हो जय हो दुर्गा मईया' और 'बिटिया दुर्गा मईया की' दिल्ली (सीबीएफसी) में 10 दिनों में क्लियर हो गईं। लेकिन मुंबई में भोजपुरी, हिंदी, मराठी जैसी सारी भाषाओं का लोड ज्यादा होने से समय लगता है। अब 'नादान' दिल्ली में भी अटकी, क्योंकि वहां रीजनल ऑफिसर बदल गए। दिल्ली का खर्चा भी महंगा पड़ता है, क्योंकि जो प्रोड्यूसर मुंबई के हैं उनका फिल्म के सेंसर के लिए दिल्ली आना जाना मुश्किल होता है। तत्काल सिस्टम भी महंगा सेंसर बोर्ड का तत्काल सिस्टम 1.5 लाख रुपए का है, जो बड़े प्रोड्यूसर्स भर सकते हैं। नॉर्मल फीस 60,000 रुपए के आसपास, फिर भी महीनों लगते हैं। चैनल रिलीज के लिए सर्टिफिकेट मांगते हैं, देरी की वजह से मीटिंग्स लेट हो जाती हैं। साउथ से बड़े प्रोड्यूसर्स आते हैं, लेकिन छोटों प्रोड्यूसर्स के लिए ये दिक्कत बरकरार हैं। सही रूप से देखे तो 15-20 दिन लगने चाहिए। धीरज मिश्र कहते हैं- मुंबई सेंसर बोर्ड में जो अतिरिक्त फीस दे रहा है, उनकी फिल्म का सेंसर आसानी से हो जा रहा है। लेकिन छोटे प्रोड्यूसर अतिरिक्त फीस देने मे समर्थ नहीं हैं। आज ओटीटी की वजह से फिल्में ज्यादा बन रही हैं। इसलिए इस डिपार्टमेंट को थोड़ा और बदलाव की जरूरत है, ताकि अधिक से अधिक फिल्मों का कम शुल्क में सेंसर हो सके। प्रोड्यूसर- डायरेक्टर की इस समस्या के बारे में दैनिक भास्कर ने सेंसर बोर्ड के लैंडलाइन नंबर पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन सेंसर बोर्ड के मुंबई कार्यालय का लैंडलाइन नंबर हमेशा की तरह अनुत्तरित रहा। सेंसर बोर्ड के एजेंट से बात की तो उन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि सेंसर बोर्ड के स्टाफ अब और अहंकारी हो गए हैं। 2-3 साल पहले साउथ फिल्म कांड के बाद सिस्टम बदला गया है। नॉर्मल फीस 28-32 हजार तो वहीं प्रायोरिटी में तीन गुना (96 हजार) प्लस थिएटर चार्ज हो गया हैं। इसे छोटे भोजपुरी प्रोड्यूसर्स नहीं भर पाते हैं। प्रायोरिटी में भी स्क्रीनिंग 5-7 दिन, सर्टिफिकेट 15-20 दिन तक हो जाती है । कंट्रोवर्शियल फिल्में तो और लेट होती हैं। एजेंट्स की एंट्री बंद हो गई है और, हमारी 400-500 लोगों की रोजी छिन ली गई हैं। ________________________________ सेंसर बोर्ड से जुड़ी यह खबर भी पढ़ें.. तमिल एक्टर विशाल ने सेंसर बोर्ड पर लगाए आरोप:6.5 लाख रुपए लेकर फिल्म ‘मार्क एंटनी’ का हिंदी वर्जन पास किया तमिल एक्टर विशाल ने CBFC (सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन) मुंबई के अफसरों पर रिश्वत लेने के आरोप लगाए हैं। विशाल की फिल्म ‘मार्क एंटनी’ 15 सितंबर को ही रिलीज हुई है। ये तमिल भाषा की साइंस फिक्शन फिल्म है।पूरी खबर पढ़ें

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