आज हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता असरानी की 85वीं बर्थ एनिवर्सरी है। असरानी वो कलाकार हैं जिनका नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। 'शोले' के यादगार जेलर से लेकर 'चुपके चुपके' के धीरेंद्र बोस तक, उन्होंने अपने हर किरदार से दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई है। उनका फिल्मी सफर संघर्ष, दृढ़ता और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा रहा है। आइए, उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ अनसुने किस्सों को जानें।
जयपुर से मुंबई तक का सफर: एक एक्टर का सपना असरानी, जिनका असली नाम गोवर्धन असरानी था, का जन्म जयपुर के एक गैर-फिल्मी परिवार में हुआ। उनके पिता की जयपुर में कार्पेट की दुकान थी और परिवार चाहता था कि वे कारोबार संभालें। हालांकि, असरानी का मन हमेशा फिल्मों और एक्टिंग में रमा रहा।
* शुरुआती संकेत: कॉलेज के दिनों में वे ऑल इंडिया रेडियो में वॉयस आर्टिस्ट के तौर पर काम करते थे। उनकी तस्वीरें कॉलेज मैगजीन में छपती थीं और उन्हें स्टेज प्ले व रेडियो कार्यक्रमों में खूब सराहा जाता था। रिश्तेदारों और पड़ोसियों की तारीफों ने उनके फिल्मी सपने को और मजबूत किया।
नौशाद के नाम की चिट्ठी और मुंबई की कड़वी सच्चाई मैट्रिक की पढ़ाई के बाद, असरानी जयपुर से मुंबई पहुंचे, मशहूर म्यूजिक डायरेक्टर नौशाद अली के नाम एक चिट्ठी लेकर। उन्हें लगा था कि नौशाद का नाम काम दिला देगा, लेकिन मुंबई की हकीकत बिल्कुल अलग निकली।
* एक महीना नौशाद को ढूंढने में: एक महीने तक वे नौशाद का पता ढूंढते रहे। जब 'आशियाना' बंगला मिला, तो वॉचमैन ने सीधे तौर पर कहा कि नौशाद साहब बहुत व्यस्त हैं और उनसे मिलने में वक्त लगेगा। * पहला गेस्ट रोल: एक साल के संघर्ष के बाद, नौशाद के भांजे की मदद से उन्हें फिल्म 'खोटा पैसा' में एक छोटा गेस्ट रोल मिला। इस रोल के लिए उन्हें अपने 6 फीट लंबे मामा का सूट पहनना पड़ा और आठ दिन तक पार्टी सीन में लाइन में खड़े रहना पड़ा। इस अनुभव ने उन्हें सिखाया कि मुंबई में बिना तैयारी के सफलता मुश्किल है।
FTII में अभिनय की बारीकियां और इंदिरा गांधी का हस्तक्षेप जयपुर लौटकर, असरानी ने अपनी गलती पहचानी और पुणे स्थित FTII में अभिनय का प्रोफेशनल कोर्स करने का फैसला किया। यहां उन्होंने अभिनय की बारीकियां सीखीं, लेकिन कोर्स खत्म होने के बाद भी संघर्ष जारी रहा। फिल्म प्रोड्यूसर्स उनके सर्टिफिकेट का मज़ाक उड़ाते थे और काम देने से कतराते थे।
* इंदिरा गांधी की भूमिका: एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब सूचना और प्रसारण मंत्री इंदिरा गांधी पुणे आईं। असरानी और उनके साथियों ने उनसे शिकायत की कि ट्रेनिंग होने के बावजूद उन्हें काम नहीं मिलता। इंदिरा गांधी ने उनकी बात सुनी और मुंबई के प्रोड्यूसर्स से FTII के प्रशिक्षित कलाकारों को मौका देने की अपील की। * किस्मत का बदलना: इस घटना के कुछ ही समय बाद, असरानी को जया भादुड़ी (बच्चन) के साथ फिल्म 'गुड्डी' मिली। यह फिल्म सुपरहिट हुई और यहीं से असरानी के करियर को नई उड़ान मिली।
'शोले' का अमर जेलर और किरदार की तैयारी अपने करियर में 300 से अधिक फिल्में करने वाले असरानी के सबसे यादगार किरदारों में से एक 'शोले' का 'अंग्रेजों के जमाने के जेलर' था।
* सलीम-जावेद का मार्गदर्शन: फिल्म के लिए जब उन्हें बुलाया गया, तो सलीम खान, जावेद अख्तर और रमेश सिप्पी ने उन्हें इस किरदार की बारीकियां समझाईं। उन्हें बताया गया कि यह किरदार बहुत शो-ऑफ करने वाला, थोड़ा बेवकूफ लेकिन खुद को दुनिया का सबसे समझदार समझने वाला है। * हिटलर से प्रेरणा: किरदार की तैयारी के लिए उन्हें वर्ल्ड वॉर सेकेंड की एक किताब दी गई, जिसमें हिटलर के 12-13 पोज थे। असरानी ने हिटलर पर बनी फिल्में देखीं, जिसमें चार्ली चैपलिन की 'द ग्रेट डिक्टेटर' भी शामिल थी। उन्होंने मोहन स्टूडियो में पूरी वर्दी और मूंछ लगाकर अपनी चाल दिखाई और तुरंत सिलेक्ट हो गए। * कटा हुआ सीन और वापसी: दिलचस्प बात यह है कि 'शोले' की लंबाई ज्यादा होने के कारण शुरुआत में उनका सीन काट दिया गया था। लेकिन साउंड रिकॉर्डिस्ट मंगेश देसाई और नागपुर के एक जर्नलिस्ट की पहल पर यह सीन दोबारा जोड़ा गया, और हिंदी सिनेमा के इतिहास में अमर हो गया।
जया-अमिताभ की शादी में बने दुल्हन के भाई असरानी और जया बच्चन का रिश्ता सिर्फ सह-कलाकारों तक सीमित नहीं था, बल्कि गुरु-शिष्य और भाई-बहन जैसा गहरा था।
* FTII में जया के टीचर: असरानी FTII में जया के टीचर थे, जहां उन्होंने जया को अभिनय सिखाया। * अमिताभ से मुलाकात: अमिताभ बच्चन से उनकी मुलाकात जया के जरिए ही हुई। जया और अमिताभ की शादी में असरानी दुल्हन के चार भाइयों में से एक थे, जिनमें गुलजार, रमेश बहल और एक रिश्तेदार भी शामिल थे। जया बच्चन आज भी असरानी को सम्मान से 'सर' कहकर बुलाती हैं।
कॉमिक से नेगेटिव रोल्स तक: असरानी की बहुमुखी प्रतिभा अपनी जबरदस्त कॉमिक टाइमिंग के लिए मशहूर असरानी ने 'अब क्या होगा', 'चैताली' और 'कोशिश' जैसी फिल्मों में गंभीर और नेगेटिव रोल भी निभाए।
* 'कोशिश' में नेगेटिव किरदार: साल 1972 में गुलजार निर्देशित 'कोशिश' में उन्होंने एक लालची और नेगेटिव किरदार 'कानू' निभाया, जो अपनी गूंगी-बहरी बहन का फायदा उठाता है। हालांकि लोगों ने उनकी अदाकारी को सराहा, पर उनसे ऐसे नेगेटिव रोल न करने की अपील भी की।
धर्मेंद्र के साथ 'चुपके चुपके' का मजेदार किस्सा फिल्म 'चुपके चुपके' की शूटिंग के दौरान धर्मेंद्र और असरानी के बीच एक मजेदार वाकया हुआ।
* सूट का सस्पेंस: असरानी को अपने किरदार के लिए सूट पहनना था, लेकिन डायरेक्टर ऋषिकेश मुखर्जी ने उन्हें सीन के बारे में कुछ नहीं बताया। जब धर्मेंद्र ड्राइवर की ड्रेस में सेट पर पहुंचे और असरानी को सूट में देखा, तो वे हैरान हो गए और सवालों की बौछार कर दी। ऋषिकेश मुखर्जी ने तब कहा, 'अगर तुम्हें सीन की इतनी समझ होती, तो तुम एक्टर नहीं होते।'
असरानी की आगामी फिल्में असरानी के निधन के बाद भी उनकी फिल्में रिलीज होती रही हैं। 20 अक्टूबर 2025 को उनकी फिल्म 'किस किसको प्यार करूं 2' रिलीज हुई थी। आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर उनकी एक और फिल्म 'इक्कीस' रिलीज हो रही है, जिसमें दिवंगत धर्मेंद्र भी नजर आएंगे। इसके अलावा, वे प्रियदर्शन की आगामी फिल्मों 'भूत बंगला' और 'हैवान' में भी दिखाई देंगे, जिनके 2026 में रिलीज होने की उम्मीद है।


