भारतीय सिनेमा और टेलीविजन के जाने-माने अभिनेता राकेश बेदी, जिन्होंने अपने कॉमिक किरदारों से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई, हाल ही में अपनी फिल्म ‘धुरंधर’ में पाकिस्तानी राजनेता जमील खान के दमदार किरदार में नजर आए हैं। इस भूमिका ने उन्हें एक अलग पहचान दी है और उनके अभिनय करियर में एक नया मोड़ लाया है। राकेश बेदी का सफर उतार-चढ़ाव भरा रहा है, जिसमें संघर्ष, जबरदस्त लोकप्रियता और यहां तक कि जान से मारने की धमकियां भी शामिल हैं।
'धुरंधर' से मिली नई पहचान राकेश बेदी ने अपनी हालिया फिल्म ‘धुरंधर’ में एक गंभीर पाकिस्तानी राजनेता जमील खान का किरदार निभाकर अपनी पुरानी कॉमिक इमेज को तोड़ा है। उन्होंने बताया कि इस भूमिका ने उन्हें एक अभिनेता के रूप में नई पहचान दी है। यह उनके करियर की उन फिल्मों में से एक है जिसने दर्शकों को उनका एक अलग पहलू दिखाया।
अभिनय की राह और IIT का त्याग राकेश बेदी का जन्म दिल्ली के करोल बाग में हुआ था। उनके पिता चाहते थे कि वे इंजीनियर बनें, जिसके लिए उन्होंने IIT की तैयारी भी की। हालांकि, एंट्रेंस टेस्ट के दिन ही उन्हें एहसास हो गया कि इंजीनियरिंग उनका क्षेत्र नहीं है। उन्होंने परीक्षा बीच में छोड़ दी और ड्रामा रिहर्सल के लिए चले गए। उनका मानना है कि जिस रास्ते पर नहीं जाना, उस पर समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। इस दृढ़ निश्चय के साथ उन्होंने अभिनय को अपने जीवन का उद्देश्य बनाया।
थिएटर: करियर का आधार राकेश बेदी गर्व से कहते हैं कि वे उन चुनिंदा अभिनेताओं में से हैं जिन्होंने लगातार 45-47 साल तक थिएटर किया है। फिल्मों और सीरियल्स के बावजूद उन्होंने कभी थिएटर नहीं छोड़ा, क्योंकि यह उन्हें प्रासंगिक और आज के जमाने से जोड़े रखता है। थिएटर से ही उन्हें अपनी ऊर्जा, आवाज और प्रतिभा का सही आकलन करने का मौका मिलता है। उनका सोलो नाटक ‘मसाज’, जिसमें वे 24 किरदार निभाते हैं, पिछले 23 सालों से लगातार चल रहा है और लॉकडाउन को छोड़कर कोई भी महीना ऐसा नहीं रहा जब उन्होंने मंच पर काम न किया हो।
फिल्म इंस्टीट्यूट का सफर दिल्ली में थिएटर करने के बाद, राकेश बेदी को लगा कि सीधे फिल्म इंडस्ट्री में जाने से उन्हें सीखने और अपना सर्कल बनाने का मौका नहीं मिलेगा। इसलिए, उन्होंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट (FTII) में दाखिला लिया। वहां की ट्रेनिंग ने उन्हें पुरानी सीखों को भूलकर नए सिरे से सब कुछ सीखने में मदद की। यहीं उनके ऐसे दोस्त बने जो आज भी उनके इंडस्ट्री के सफर में साथ हैं।
पहला मौका और शुरुआती फिल्में राकेश बेदी के अभिनय करियर की शुरुआत 1979 की फिल्म 'एहसास' से हुई, जिसे ‘शोले' के प्रोड्यूसर जीपी सिप्पी ने प्रोड्यूस किया था। यह उनके लिए एक तरह का कैंपस प्लेसमेंट था, क्योंकि सिप्पी साहब ने FTII कॉन्वोकेशन में उनका प्रदर्शन देखने के बाद उन्हें अपनी फिल्म में काम करने का मौका दिया था। हालांकि, 'एहसास' से पहले 'हमारे तुम्हारे' रिलीज हुई थी, जिसमें उन्हें संजीव कुमार के साथ काम करने का अवसर मिला।
'चश्मे बद्दूर' और अविस्मरणीय किरदार उनके FTII के क्लासमेट DOP सुरेंद्र सैनी की वजह से राकेश बेदी को सई परांजपे की फिल्म ‘चश्मे बद्दूर' में काम करने का मौका मिला। उन्होंने तुरंत समझ लिया कि यह एक अच्छी, साफ-सुथरी और मजेदार फिल्म होगी। उन्हें उस वक्त नहीं पता था कि 40 साल बाद भी इसकी चर्चा होगी, लेकिन आज यह फिल्म टाइमलेस क्लासिक्स में से एक मानी जाती है।
'एक दूजे के लिए' और मिली जान से मारने की धमकियां राकेश बेदी के करियर की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक फिल्म ‘एक दूजे के लिए’ भी रही। इसमें उन्होंने रति अग्निहोत्री और कमल हासन के साथ एक ह्यूमरस विलेन का किरदार निभाया था। इस फिल्म के रिलीज होने के बाद उन्हें जान से मारने की धमकियां मिली थीं, क्योंकि उनके किरदार की वजह से फिल्म में नायक-नायिका की मौत होती है। यह उस दौर की बात है जब दर्शक फिल्मों को लेकर बेहद जुनूनी होते थे।
टीवी की जबरदस्त ताकत: 'ये जो है जिंदगी' फिल्मों के अलावा, राकेश बेदी ने टेलीविजन पर भी अपार लोकप्रियता हासिल की। उनके टीवी शो ‘ये जो है जिंदगी' ने उन्हें जबरदस्त पहचान दिलाई और उन्हें टीवी की ताकत का एहसास कराया। दो-चार एपिसोड आने के बाद ही लोग उनके दीवाने हो गए थे। सड़क पर चलते हुए लोग उनके पीछे आते, ऑटोग्राफ मांगते और उनसे बातें करते। यह उनकी लोकप्रियता का एक अलग स्तर था, जो फिल्मों से भी ज्यादा था।
अपनी शर्तों पर काम और छोटे टीवी रोल 'ये जो है जिंदगी' के बाद उन्होंने ‘श्रीमान श्रीमती’, ‘यस बॉस’ और ‘हम सब एक हैं’ जैसे कई चर्चित टीवी शो किए। हाल ही में, उन्होंने 'भाबी जी घर पर हैं' और 'तारक मेहता का उल्टा चश्मा' में छोटे रोल किए, जिसे लेकर लोगों ने सवाल भी उठाए। राकेश बेदी बताते हैं कि यह उनकी खुद की पसंद है। प्रोड्यूसर्स चाहते हैं कि वे हर एपिसोड में 30 दिन काम करें, लेकिन उन्हें यह सूट नहीं करता क्योंकि उन्हें थिएटर जारी रखना है और 'धुरंधर' जैसी फिल्में करनी हैं। वे कहते हैं कि पैसा कमाना आसान है, लेकिन एक एक्टर के तौर पर खुद को संतुष्ट करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
देवानंद साहब और बदले दौर राकेश बेदी पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि देवानंद जैसे सुपरस्टार भी कलाकारों को खुद फोन करते थे। वे सीधे उनसे बात करते थे, कोई बिचौलिया नहीं होता था। आज समय बदल गया है, कास्टिंग डायरेक्टर्स और एजेंसीज आ गई हैं, जो एक रोल के लिए सैकड़ों लोगों में से चुनाव करने में मदद करती हैं। हालांकि, राकेश बेदी ने हमेशा अपनी शर्तों पर जिया है और कभी काम मांगने किसी के ऑफिस नहीं गए। वे मानते हैं कि अगर किसी को उनकी जरूरत होगी, तो वह खुद आएगा।
उतार-चढ़ाव और संघर्ष राकेश बेदी की जिंदगी में भी अमिताभ बच्चन जैसे बड़े सितारों की तरह उतार-चढ़ाव आए हैं। एक दौर ऐसा भी था जब उनके पास न काम था और न ही पैसे। उनके बैंक बैलेंस में सिर्फ 1 रुपया बचा था। उस मुश्किल समय में, उन्होंने 1 रुपये में 6 केले खरीदकर खा लिए और सोचा कि आज का दिन निकल गया, कल जो होगा देखा जाएगा। उन्होंने कभी परिवार से पैसे नहीं मांगे। ऐसे मुश्किल दौर में भी थिएटर हमेशा उनका साथ देता रहा, जिससे वे सक्रिय और मानसिक रूप से व्यस्त रहे।
राकेश बेदी का जीवन और करियर उनकी लगन, प्रतिभा और अपनी शर्तों पर जीने के जुनून का प्रमाण है। उनकी कहानी कई aspiring कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है।


